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Anndaata/अन्नदाता

गोरे बदन जब काले हो जाते,
तन पर के कपड़े भी चिथड़े हो जाते,
सूरज की ताप जब हार मान जाती है,
तब जा के खेतों में पौध लहलाती है,
तब जा के खेतों में पौध लहलाती है।

खेतों में पौधों को सींचता है ऐसे,
थाली में मोती सजाता हो जैसे,
खून-पसीने से फसल जब नहाती है,
तब जा के खेतों में पौध लहलाती है,
तब जा के खेतों में पौध लहलाती है।

काँधे पर हल और जुआठ लिए चलता,
बैलों के संग-संग बैल बन के रहता,
आंधी तूफान जब हार मान जाती है,
तब जा के खेतों में पौध लहलाती है,
तब जा के खेतों में पौध लहलाती है।

सोने और चांदी से भरते खजाने,
कीमत अनाज की पेट पहचाने,
कोठी अनाज विहीन हो जाती है,
तब जा के खेतों में पौध लहलाती है,
तब जा के खेतों में पौध लहलाती है।

है कौन जो प्रेम करता है इससे,
मतलब के रिश्ते रखता है इससे,
कहते धनिक नाक अपनी दबाए,
पसीने की बदबू आती है इससे,
नियति,नियत से लड़ता किसान,
अथक परिश्रम करता किसान,
भरता जगत का यही पेट और खुद,
दो वक्त रोटी को मरता किसान,
पीठ-पेट सटकर जब एक हो जाती है,
तब जा के खेतों में पौध लहलाती है,
तब जा के खेतों में पौध लहलाती है।

!!!मधुसदन!!!

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