अपने हो सफर में तो,थकन नहीं होता,
बिन अपनों के सफर,में जशन नहीं होता,
मंजिल की चाह तो,मंजिल मिला देती है,
गैरों के बीच मगर जशन नहीं होता,
याद मैं भी आऊंगी मंजिल पाने के बाद,
क्या हंस पाओगे हमसे,दूर जाने के बाद,
सह नहीं पाऊंगी दर्द,मैं भी जुदा होकर,
रह पाओगे क्या मेरे मिट जाने के बाद,
हम भी होते साथ गर,हमें तुम समझ जाते,
हाथों में हाथ लिए, हंसकर उम्र गुजर जाते,
सफर होते संग हम तो,थकन भी नहीं होता,
अपनों के बगैर फिर,सफर-सफर नहीं होता।।
!!! मधुसुदन !!!

