किसी के घर जले,किसी की गाडियाँ,
किसी की जिंदगी की उड़ान छीन ली,
वाह रे गंगा यमुनी तहजीब!
ये तेरा कैसा प्रेम?
जिसने किसी का एक ही सूरज था,
वो इकलौती संतान छीन ली।
हम इसे,तेरे हक की मांग कहें,आंदोलन,
कोई षड्यंत्र,या तुम्हें गुमराह कहें,
जहाँ धर्म देख घर और गाडियाँ जलाई जा रही थी,
जहाँ पेट्रोल बम से घरों में आग लगाई जा रही थी,
बंद घरों के टूटते ताले,
निर्दोषों पर तेजाब के होते हमले,
ये तेरा कैसा आंदोलन! ये तेरा कैसा प्रेम?
जिंदगी गुजर जाती है एक आशियाना बनाने में,
तुम्हें रहम नही आई पूरी बस्तियाँ जलाने में।
तड़पते लोगों के आँखों में,वो तस्वीर देख ली,
हमने जलता दिल्ली नही कश्मीर देख ली।
!!!मधुसूदन!!!
Delhi/दिल्ली

