
एक दौर था अभावों का,
तब पकवान बामुश्किल बनते,
और रंग खरीदने को पैसे भी कम थे,
मगर होली का रंग कैसा? ये मत पूछना,
बस उमंग ही उमंग थे, रंग ही रंग थे।
तब बनती थी दोस्तों की टोलियाँ,
टूट पड़ते उनपर जो छुपते,शर्माते,
नजरों से बचना नामुमकिन,
कौन ऐसे जो कोरे रह जाते,
तब बजते ढोलक,झाँझ
घर-घर होली गाते,
माना अभावों का दौर था
मगर पुए,
वो तो हर घर में खाते,
मगर अब प्रचुरता का दौर,
सबके घरों में रंगों से भरे डब्बे और पुए भी,
परंतु जिधर देखो उधर डायबिटीज का कहर,
क्यों ना हो गाँव क्यों ना हो शहर,
अब नही होती होली वैसी,ना ही वैसे पुए खा पाते,
होली तो आती है अब भी रंगों लिए,
मनाते हम भी हैं मगर
उन अभावों वाले दिनों को
भूल नही पाते,भूल नही पाते।
आप सभी को होली की ढेर सारी शुभकामनाएं। !!!Madhusudan!!!

