ऊँची चाहरदीवारी,जड़े ताले किवाड़
जहाँ पग-पग खड़े पहरेदार देखते हैं,
कैदी हूँ,कैद से निकलना है मुश्किल,
झरोखे से खुला आसमान देखते हैं।
चुनकर जिसे मन ही मन हमने ऐंठा,
सच है वही तख्त पर आज बैठा,
फिर क्यों हम खुद को बेहाल देखते हैं,
कैदी हूँ,कैद से निकलना है मुश्किल,
झरोखे से खुला आसमान देखते हैं।
महंगी बढ़ी घर में रोती है सजनी,
उजड़ा व्यापार भिन्न कथनी और करनी,
वादों का विस्तृत भंडार देखते हैं,
कैदी हूँ,कैद से निकलना है मुश्किल,
झरोखे से खुला आसमान देखते हैं।
बेबस कृषक,मजदूर फटेहाल,
बुरे नारी के दिन बुरे हाल रोजगार,
कहने को केवल हुकूमत है अपनी,
अडानी,अम्बानी की सरकार देखते हैं,
कैदी हूँ,कैद से निकलना है मुश्किल,
फिर भी खुला आसमान देखते हैं।
जातीय बिसात पर सजती सियासत,
नफरत में लिप्त राजनीत के विशारद,
सबकी एक सोच और चाल देखते हैं,
कैदी हूँ,कैद से निकलना है मुश्किल,
फिर भी खुला आसमान देखते हैं।
शिकवे बहुत और शिकायत भी तुमसे
जाएं तो जाए कहाँ दूर तुमसे,
किश्ती फँसी मजधार में वतन के,
दूजा ना और पतवार देखते हैं,
कैदी हूँ,कैद से निकलना है मुश्किल,
फिर भी खुला आसमान देखते हैं।
!!!मधुसूदन!!!
Qaidi/कैदी

