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Yaaden

मैं हूँ,मैं नहीं भी हूँ,
परन्तु,
तुम ही तुम हो,
मैं जहां भी हूँ।

अजीब हैं येे यादें,
आती है सबकुछ,
डूबा जाती है,
गिरता हूँ,
सम्हलता हूँ,
फिर तेरी यादों की,
दरिया में
उतर जाता हूँ।

गलती हुई है,
नादानी कर बैठा,
कभी निकला नहीं घर से,
तभी तो,
रेगिस्तान को,
समन्दर समझ बैठा,
अब खुद को,
बहुत समझाता हूँ,
तुमसे दूर होने की,
निरंतर,
तरकीब लगाता हूँ,
परंतु,
जब भी पलकें बंद करूँ,
उसी बवंडर में,
खुद को उलझा,
पाता हूँ।

दिल पर लगी निशान,
मिटाना,
आसान नहीं,
सच है तुझे भुलाना भी,
आसान नहीं,
माना कि मेरी यादों पर,
तेरा ही सल्तनत है,
फिर भी,
जीवन में मेरे,
तेरा वापस आना भी,
आसान नहीं,
खुली आंखों में,
तेरी ही,
जालिम सूरत है,
बंद आंखों में,
तेरी ही,
हुकूमत है,
तो लो आंखों को,
बंद करता हूँ,
उसी बवंडर के अधीन,
पुनः खुद को करता हूँ,
जहाँ,
मैं हूँ,मैं नहीं भी हूँ,
परन्तु,
तुम ही तुम हो,
मैं जहां भी हूँ।

!!!Madhusudan!!!

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