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KISSA YA PREM/किस्सा या प्रेम 2

Image Credit :Google

एक किस्सा है सुनाऊँ क्या?

प्रेम हमने भी किया,

छुपाऊँ क्या।

शुरुआत कहाँ से करूँ,

उन मस्ती के पलों से या तन्हाई से,

वफ़ा या उनकी बेवफाई से,

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आखिर जन्नते इश्क में वो शाम आई,

उठते बवंडर को थामना मुश्किल,

लबों पर दिल की जज्बात आई,

वे नित्य की भांति

उस दिन भी सम्मुख आए थे,

नजरें मिली,वैसे ही मुस्कुराए थे,

मगर उस दिन हालात कुछ बदले थे,

उन्होंने भी शायद जज्बात को समझे थे,

धड़कता दिल बरसने को बेकरार था,

उन्हें भी शायद इस पल का

लम्हों से इंतजार था,

“तुमसे मुहब्बत है”

होठ एकाएक बुदबुदाए थे,

प्रेम ऐसे ही होता है उन्होंने भी कहा

और मुस्कुराए थे,

जुबाँ से निकले चंद शब्दों ने मानो

जिस्म में नई जान डाल दी,

हार गई खामोशी,

धरा ने आसमान थाम ली,

यूँ तो खुशियाँ पहले भी थी बहुत मगर,

नजरों से नजरों का,अधरों से अधरों का,

सपनों से सपनों का मिलन,

संग

दो अस्तित्वों का घुल,

एक दूसरे में मिल जाने की खुशी कैसी,

बताऊँ क्या?

प्रेम हमने भी किया,

छुपाऊँ क्या।

!!!मधुसूदन!!!

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