जब भी उठती कलम चिल्लाता कोरा कागज,
सिसक सिसककर दर्द सुनाता कोरा कागज।
महिमामंडित गद्दारों का करते करते,
शब्द बने बोझिल,शब्दों को सहते सहते,
ऊब गया, खुद पर शर्माता कोरा कागज़,
जब भी उठती कलम चिल्लाता कोरा कागज।
लाखों खोए वीर वतन पर मिटनेवाले,
नहीं यहाँ पर कोई उनपर लिखनेवाले,
कब आएंगे वे दिन,कब वो कवि बता दे,
बलिदानी के नाम शब्दों की झड़ी लगा दे,
जब बरसेंगे देशप्रेम के शब्द मनोहर,
जब तरसेंगे मसि बनने को ताल सरोवर,
तब हर्षित होगा बतलाता कोरा कागज,
सिसक सिसककर दर्द सुनाता कोरा कागज,
सिसक सिसककर दर्द सुनाता कोरा कागज।
!!!मधुसूदन!!!
Kora Kagaj/कोरा कागज

