
ये आहट प्रलय या कर्मों की सजा है,
या कोई सबक या कयामत की निशा है।
है क्या ये सबकी समझ से परे,
शीतल हवा भी जहर से भरे,
सूनी हैं सड़कें,गलियाँ वीराना,
कैदी बना है ये सारा जमाना,
क्रंदन,शवों में ये सिमटा जहाँ है,
ये आहट प्रलय या कर्मों की सजा है।
दिनकर किरण,चन्द्र की कौमुदी से,
कैसा तिमिर ना डिगे इस महि से,
आँखों के आगे छाया अंधेरा,
रातें क्या तम का है दिन में बसेरा,
धुंधली दिशाएँ,अरमां धुआँसा,
बेबस खुदा या उसी का तमाशा,
ना युक्ति कोई कुंद बुद्धि पड़ी है,
भंवरजाल में जग की किस्ती पड़ी है,
हे भगवन,नियंता दया मांगते हम,
किए भूल दाता क्षमा मांगते हम,
दया कर,ना सूझता ये कैसी निशा है,
ये आहट प्रलय या कर्मों की सजा है।
!!!मधुसूदन!!

