
स्तब्ध हूँ, इस तरह चले जाना तेरा ठीक नही,
माना जीवन क्षणभंगुर मगर,
इस कदर अपनों को
तड़पाना भी तो ठीक नही,
काश अपनी मजबूरियाँ अपनों को बताते,
कोई न कोई राह जरूर निकल आते,
थोड़ी सी चोट और छलक जाते हैं आँसू,
छुपाता कोई बिस्तर भिगोता है,
तुम तो मर्द है,
क्या हुआ,
ऐसे लड़कियों की तरह रोता क्यों है?
कुछ ऐसा ही कहा जाता जब लड़के रोया करते,
दर्द है तो रोना पाप कैसे,क्यों ऐसे कहा करते,
दिल का दर्द बदन दर्द पर भारी,
न जाने कितनों के आंखों से,
अश्क ना छलके,
जिंदगी हारी,
तुम भी रोक ना पाए स्वयं को,
और छोड़ गए अपनो को बीच मझधार!
अरे इस कदर गमों की दुनियाँ में रहनेवाले,
मत रोक आँसू छलक जाने दे,
दावानल बनने से पहले दर्द बह जाने दे,
गमों के समंदर में तुम भी स्वयं को डुबोता क्यों है,
जीवन अनमोल व्यर्थ खोता क्यों है,
कहने दो कहनेवालों को,
कि, क्या हुआ,
तुम तो मर्द है,
ऐसे लड़कियों की तरह रोता क्यों है,
ऐसे लड़कियों की तरह रोता क्यों है।
!!!मधुसूदन!!!

