तिनका तिनका जोड़ के कुटिया,एक बनाता है इंसान,
जिसके सिर को छत मिल जाता,कितना इतराता इंसान।
कितने ऐसे आज भी जिनके,
सिर पर ऐसी घास नहीं,
चलते चलते पैर थके,
कितने को अब कुछ आस नहीं,
आंखें बन जाती है पत्थर,ख्वाब नही पाता इंसान,
जिसके सिर को छत मिल जाता,कितना इतराता इंसान।
सारी उम्र गुजर जाती है,
कुटिया एक बनाने में,
कितनी खुशियां जश्न वो जाने,
जिसका महल जमाने में,
अगर बिखरती कुटिया जिसकी,जिंदा मर जाता इंसान,
जिसके सिर को छत मिल जाता,कितना इतराता इंसान।
सोचो गौर से कश्मीर में,
पंडित कितने रोये होंगे,
चमन उजड़ते देखा उसमे,
कितने ख्वाब संजोए होंगे,
गौर करो जब बीच सड़क पर,
जिसने खून बहाया होगा,
जाति-धर्म और गौरक्षा के,
नाम पर चमन उजाड़ा होगा,
हृदयहीन वह धर्महीन,मानव जो ना समझा इंसान,
साया सिर से छीन जहाँ में कैसे इतराया इंसान।
हमसब है एक रब के बच्चे
भरा हुआ दिल कोमलता,
अगर ना होता जाति,मजहब,
कितनी होती समरसता,
कश्मीर फिर नही सुलगता,
महल ना होता खंडहर सा,
गाय,भेड़ का द्वंद ना होता,
शायद होती मानवता,
मजहब के इस अंधेपन में,रोज बिखरता है इंसान,
जिसके सिर को छत मिल जाता कितना इतराता इंसान।
!!! मधुसूदन !!!

