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KANHA/कान्हा

मैं मानव हूँ क्षुद्र जनम से,ज्ञानेश्वर दो ज्ञान की शक्ति,
हूँ पापी मैं सच जितना उतनी ही सच्ची मेरी भक्ति।
ईर्ष्या,द्वेष,कपट,छल मुझमें,
प्रेम सरोवर भर दो तुम
मैं कान्हा दुर्योधन जैसा,
अर्जुन मुझको कर दो तुम,
मैं हूँ क्षुद्र,नीच,पापी जन,
सब माया तेरी यदुनन्दन,
हे कृष्ण,हरि,कमलनाथ दे,इस माया से हमें विरक्ति,
हूँ पापी मैं सच जितना उतनी ही सच्ची मेरी भक्ति।
तेरा ही सब मैं भी तेरा,
हे गिरिधर कर दूर अँधेरा,
माखन,मिश्री भोग लगाऊँ,
यथाशक्ति मैं तुम्हें सजाऊँ,
किसके क्या तुम नही जानते,
केवल मूरत नही मानते,
हे माधव ना कंस बनूँ मैं,दे मुझको कुछ ऐसी युक्ति,
हूँ पापी मैं सच जितना,उतनी ही सच्ची मेरी भक्ति।
काल तुम्ही कण-कण में तुम,
हे मुरलीधर,गोपाल,चतुर्भुज,
वैसे तो हर युग में तुम हो,
हमें ज्ञात वह द्वापर युग,
मैं अज्ञानी क्या पहचानूँ,
ज्ञानी जब ना जान सके,
कितने तब थे पास खड़े जो 
तुमको ना पहचान सके,
तुम राजा हो तुम्ही भिखारी,
तुम शिकार और तुम्ही शिकारी,
तुम सृष्टिकर्ता,सर्वत्र तुम,पाप हरो,निर्गुण विश्वमूर्ति,
हूँ पापी मैं सच जितना उतनी ही सच्ची मेरी भक्ति।
हूँ पापी मैं सच जितना उतनी ही सच्ची मेरी भक्ति।
!!!मधुसूदन!!!

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