BEBAS MAJDOOR/बेबस मजदूर

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दर्दे-गम बहुत है गिनाऊँ कैसे,
मजबूर हुआ खुद को बचाऊँ कैसे।

हल,कुदाल,घन,चक्की चलाते,
तपती हुई भट्ठी में तन को गलाते,
टप-टप पसीने टपकते रहे,
जलता लहू फिर भी हँसते रहे,
मजदूर हूँ खुद को मजबूर नही माना,
भीख किसे कहते हैं मैंने नही जाना
स्वाभिमानी हम भी,
स्वाभिमान दिखाऊँ कैसे,
मजबूर हुआ खुद को बचाऊँ कैसे।

खाते में व्यापारी तनख्वाह नही डालते,
शोषण कितना,क्या बताऊँ,
क्या तुम नही जानते?
हाजरी,ओवर टाइम,नाईट भी लगाते,
लोहे की मशीन हम से हार मान जाते,
फिर भी गरीबी,ना कोई डगर,
भेड़ों सा जीवन है किसको खबर!
गुत्थी नसीब की सुलझाऊँ कैसे,
मजबूर हुआ खुद को बचाऊँ कैसे।

आज ख्वाब चूर सभी,दूर दीनानाथ आज,
हाथ जगन्नाथ फिर भी हो गए अनाथ आज,
काम नही हाथों में,जान नही आँतों में,
रोटियों से दूर,दूर नींद नहीं आँखों में,
जेब फटे-हाल पड़े पैर में हैं छाले,
आँखें है नम,मौत पग-पग हमारे,
नक्शे पर खुद को रख पाऊँ कैसे,
मजबूर हुआ खुद को बचाऊँ कैसे,
मजबूर हुआ खुद को बचाऊँ कैसे।
!!!मधुसूदन!!!

30 Comments

  • अभी मज़दूरों की स्थिति बेहद दयनीय है. मुझे उन अनाम मज़दूरों के लिए और ज़्यादा तकलीफ़ होती है जो किसी दुर्घटना के शिकार हो गए.

    • जिनका कोई नही। खाने को पैसा नही,पाइन को पानी नही दाह संस्कार के वगैर!
      आह! सोचकर ही रूह कांप जा रहा है।
      आखिर अपनो से बिछड़ लोगों के कदम कैसे घर की ओर बढ़ रहा होगा। कितनी उनकी आत्मा तड़प रही होगी।

  • अच्छा था भाई। सरकार के पास अच्छा मौका था अपनी ज़मीर बिकी नहीं है दिखाने का। वे चूक गए

    • बिल्कुल सही कहा भाई। मौका था सारे पाप धोने के मगर चूक गए।

  • दर्द मेरा तुम तौलोगे कैसे
    वोट बैंक नहीं मैं
    मेरे बारे में तुम बोलोगे कैसे?

    • कैसी पीड़ा
      दर्द
      तुम क्या जानो बाबू,
      बीमारी से मरे या भूख से उतना गम नही,
      जितना खुद को उपेक्षित जानकर हो रहा है।
      सुक्रिया मित्र दर्दभरे शब्द निकले आपके दिल से।

  • “अच्छी कविता पर सज़ा भी मिल सकती है।”

    — हरिशंकर परसाई

    😃🌸❤

    • अभी उतनी अच्छी नही है। डांट से भी दूर है।😁

  • आज की पीड़ा दर्शाती हुई मार्मिक रचना … श्री राम सबका भला करें 🌸

    आज ख्वाब चूर सभी,दूर दीनानाथ आज,
    हाथ जगन्नाथ फिर भी हो गए अनाथ आज,
    काम नही हाथों में,जान नही आँतों में,
    रोटियों से दूर,दूर नींद नहीं आँखों में,

    ये पंक्तियां हृदय स्पर्शी

    • श्रीराम ने रावण का भी भला किया था और अहिल्या का भी।
      सुग्रीव का भी भला किये और विभीषण का भी।
      हम इंसान पता नही किस श्रेणी में खुद को खड़ा कर लिए हैं।

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