CHUPPI/चुप्पी

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सुना है श्रद्धा हो मन में तो रब
पत्थर में मिल जाते हैं,
प्रेम की भाषा इंसां क्या,
पशु-पक्षी,
जानवर भी समझ जाते हैं,
माँ खुश होती,जब बच्चा दूध पी लेता,
दानी खुश होता जब जरूरतमंद को कुछ दे देता,
प्रफुल्लित होती नदियाँ,
किसी की प्यास मिटाकर,
झूम उठते वृक्ष,
अपना फल खिलाकर,
हिम ना पिघलता,
नदियों का कोई वजूद नही होता,
तुम ना होते,
इन शब्दों का भी
कोई मूल्य नही होता,
पतझड़,मधुमास,पावस,
आते जाते
और
आते जाते,
दिवस-रात्रि,
सूर्य और चांद भी,
रुकता कहाँ कुछ!
फिर ये उदासी कैसी?
माना,ठीक नही ज्यादा बोलना,
मगर इतनी चुप्पी भी तो ठीक नही,
हवाओं में घुले मेरे चीखते शब्द,सुनाई नही दे रहे,
मगर दिल में उठते ज्वार भाटे की शोर,
दबाना भी तो ठीक नही,
प्रकृति मुस्कुरा रही,
हवाएँ सरगम सुना रही,
चिड़ियों की शोर,
कभी गोधूलि,कभी भोर,
तुम्हें जीवन का यथार्थ समझा रही,
कुछ भी स्थिर नही,
फिर ये कैसी झिझक!
तुम स्थिर कैसे?
कभी तो कदम बढाकर देखो,
कभी तो पलकें उठाकर देखो,
बेतमलब कभी मुस्कुराकर कर देखो,
कभी तो हमें,कुछ सुनाकर देखो,
क्या पता!
सूखी नदी को जल स्रोत मिल जाए,
और हमें हमारा दोस्त,
जीवन-साथी,
जिसे अपनी दिल की बात अभी तक समझा ना पाए।
!!!मधुसूदन!!!

43 Comments

  • देखा है मैंने
    जितना शब्दों में आवाज नहीं है उससे कई गुना शोर है चुप्पी में।

  • Really loved this.
    हवाओं में घुले मेरे चीखते शब्द,सुनाई नही दे रहे,
    मगर दिल में उठते ज्वार भाटे की शोर,
    दबाना भी तो ठीक नही,

  • बेहद खूबसूरत क्रति..!
    लाजबाव लेखन प्रस्तुति,
    कैसे एक ‘चुप्पी’ में आपने सारे भेद समेट लिए,
    आपकी प्रशंसा के लिए मेरे पास शब्द नहीं, परंतु एक शब्द आपके लिए जरूर छोडुंगा..
    अद्भुत रचना..!
    ऐसे ही लिखते रहिए और अपने कविता रूपी पुष्प से अपने और हमारे जीवन को महकाते रहिए 🙂

    • बहुत बहुत धन्यवाद आपका जतिन जी। सहृदय आभार।
      खुद को एवं परिवार को अगले कुछ महीने सम्हालकर रखिए। ईश्वर सबकुछ ठीक रखे।

      • आपका स्वागत है मधुसुदन जी। परंतु हम आपसे बहुत छोटे हैं इसलिए हो सके तो हमें सिर्फ हमारे नाम से ही संबोधित करें।
        आप भी अपना एवं अपने परिवार का ध्यान रखिए।

        • बिल्कुल सजग हैं। प्रयास रहेगा आगे।

          • ऐसे ही रहिए। ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि संकट का समय जल्द ही समाप्त हो।

    • धन्यवाद आपका पसन्द करने के लिए।

  • ये कविता हमे किसी की याद दिला रही🌸❤😃
    इस कविता का जवाब इक कविता से ही दूंगा😁

    शानदार कृति

    • अरे भाई ये खुद ही किसी विस्तृत कविता से निकली है। कितना चिरियेगा इसे। बस कीजिये।😁।
      दरअसल मैंने प्रिय मित्र अभय जी की एक रचना पढ़ी और एक कविता बन गई।
      अब किसी की याद दिला रही वो अलग बात है।😁

      • 😂❤🙏 ओके ब्रो

        प्रेम लिखने का नही करने का विषय है हालांकि ये विषय ही नही है ये उतना ही यथार्थ है जैसे मृत्यु उतना ही सरल जैसे गंगा की लहरें उतना ही जटिल जैसे कोयले में फंसा युगों तक पला हीरा … प्रेम असीमित सम्भावनाओ से भरा सम्पूर्ण चक्र है .. बने रहिए इसकी परिधि के बीचोबीच !!

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