PATTHAR/पत्थर

मैं तुक्ष,
राहों में बिखरा मामूली पत्थर,
मर्जी तेरी ईश्वर मान मंदिर में स्थापित कर,
महल बना या सेतु,
मगर
अरे हाड़-मांस के बने
सभ्य और संस्कारी मानव,
मुझे किसी की हत्या का कारण मत बना,
माना मैं निर्जीव बिना जान का,
मगर तुझे क्या पता,
तेरी खुशियों में मैं भी,
खुश होता हूँ,
और जब
किसी निर्दोष की हत्या में हमें,
अपना साझीदार बनाता है,तो अरे बेखबर,
औरों की तरह मैं भी रोता हूँ,
मैं भी रोता हूँ।
!!!मधुसूदन!!!


उफ़ !! आपकी पत्थर नामक कविता पर मैं निःशब्द हूँ | अश्रु पूरित श्रद्धांजलि
पुनः धन्यवाद आपका।🙏🙏
रक्त में लिपटे पत्थर चीखते
रहम नही कर पाए,
फिर भी तुम इंसाँ कहलाए?
दो सन्यासी तड़प रहे थे,
दानव बन जन गरज रहे थे
बन गई शिला मोम मगर ना
मोम,मोम बन पाए,
फिर भी तुम इंसाँ कहलाए?
क्या बात है !! साहित्य की पुण्य सलिला ऐसे ही अबाध प्रवाहमान रहेगी ••••
🙏🙏🙏
इस सामयिक कविता में आप की लेखनी ने राष्ट्र की अश्रुपूरित श्रद्धांजलि अर्पित कर दी है ,उन संतों को अश्रुपूरित नमन !!
बहुत बहुत धन्यवाद आपका। नमन।🙏🙏
मेरे आलेखन को लाइक करने के लिए धन्यवाद ! साथ ही मुझे फलो करने के लिए अनंत कोटि साधुवाद !!
स्वागत आपका।🙏🙏
धन्यवाद जी
Amazing poem!
Thank you very much.🙏
You’re welcome
बहुत बढ़िया कविता एक शर्मनाक कृत्य पर …प्रधानमंत्री भी चुप है …अच्छा नहीं कर रहे साहेब …
बहुत दुखद भाई।
पक्ष मौन विपक्ष मौन,
दो सन्यासियों की हत्या पर तख्त मौन,
कहते हैं दया से बड़ा कोई धर्म नही,
दयाहीनता से बड़ा कोई अधर्म नही,
समाज के लिए जिसने अपना घर छोड़ दी,
वसुधैव कुटुंबकम जिसकी सोच,
सारी दुनियाँ से अपनी नेह जोड़ ली,
जिसका सर्वे भवन्तु सुखिनः
सर्वे सन्तु निरामयाः
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु
मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्
से ज्यादा कोई अरमान नही,
शायद उन सन्यासियों को
अपनी धरती पर अब कोई स्थान नही,
शायद उन सन्यासियों को
अपनी धरती पर अब कोई स्थान नही।
Waah bahut badhiya dost❤😃
मर्मस्पर्शी कविता.
धन्यवाद आपका सराहने के लिए।
Nice poem…thoughts&emotions are very good…👌👌👌
Thank you very much for your valuable comments.
Bahut hi sundar!
धन्यवाद आपका पसन्द करने के लिए।
मैं शीशा सा पत्थर हूँ।
शीशे से वार करो तो
वे टूटकर बिखर जाते हैं,
मगर पत्थर
बेचारे टूट भी नही पाते हैं।
धन्यवाद आपका सराहने के लिए।
🙏
🙏🙏
माखनलाल चतुर्वेदी की एक कविता थी “पुष्प की अभिलाषा” आशा है आपने पढ़ी ही होगी, आपकी यह कविता का नाम यदि “शिला की अभिलाषा” दी जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी! बहुत बढ़िया!!
हाँ। बिल्कुल पढ़ी है और जुबानी याद भी है।धन्यवाद मित्र पसन्द करने और सराहने के लिए।
मुझे लगा ही था आपको तो कण्ठस्थ होगा😀🙏
🙏🙏
कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं
गाते गाते लोग चिल्लाने लगे हैं
अब तो इस तालाब का पानी बदल दो
ये कँवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं
अब नई तहज़ीब के पेश-ए-नज़र हम
आदमी को भून कर खाने लगे हैं
~ दुष्यंत कुमार
वाह। मन प्रसन्न हो गया।