UMMID/उम्मीद

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सजल नैन,
बालम परदेस,
दशा डराए।

बंद शहर,
कोरोना का कहर,
नींद न आए।

अस्थिर मन,
हिमालय सा अटल,
किसे दिखाएँ।

आह!नियति,
संकट में है प्राण,
कोई बचाए।

रब की पूजा,
करते निशदिन,
चैन ना आए।

बंद झरोखे,
गरजते बादल,
हवा डराए।

ढाढ़स देते,
आएगा मधुमास,
लोग जो आए।

अकेलापन,
अपनो की है भीड़,
कौन हँसाए।

!!!मधुसूदन!!१

36 Comments

      • मधुसूदन जी आपको बहुत-बहुत बधाई कविता संकलन छपने पर. ऐसे हीं लिखते रहें. यह ख़ुशख़बरी मुझे शैंकी के पोस्ट मिला.
        राँची के किसी प्रकाशन हाउस से छपवाया है क्या?

    • आपको पसंद आया —-अच्छा लगा। धन्यवाद आपका।

  • इसपर हम भी लिख डाले …उम्मीद पर दुनिया कायम🌸❤😃

    निशा का घोर पहरा

    मानवता बेहाल

    मृत्यू तांडव

    .

    छाले पैरों पर

    पैर घर की ओर

    घर अभी दूर दिखता

    .

    सूखा कंठ , सूखी रूह

    सूखी स्वप्नदृष्टि

    तरल बस नयन

    .

    • वाह। क्या बात।उम्मीद पर दुनियाँ कायम। लाजवाब। शायद पन्ने ऐसे ही कतारबद्ध होते होंगे किताबों के।

  • वाह वाह

    आपकी सबसे निराली बात…. आप बहुत अच्छे विद्यार्थी है शिक्षा के…माँ सरस्वती ऐसे ही आप पर कृपा रखे 🌸

    लोग जल्दी सीखते नहीं अपनी अकड़ में रहते बड़ा छोटा कद डिग्री में फसे रहते….आप विनम्र हो ,ईमानदार साहित्य के प्रति

    आप से कितना कुछ सीखने को मिला यहाँ मुझे….

    माँ हिंदी के लाल मेरे daddu प्रणाम😃🌸❤

    • आपके सजल शब्द पढ़ते पढ़ते कविता का रूप ले लिया। और आज कुछ भी प्रकाशित नही होना था मगर एक कविता प्रकाशित हो गई। धन्यवाद।

    • बहुत बहुत धन्यवाद आपका सराहने के लिए।🙏

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