Kora Kagaj/कोरा कागज

जब भी उठती कलम चिल्लाता कोरा कागज,सिसक सिसककर दर्द सुनाता कोरा कागज।महिमामंडित गद्दारों का करते करते,शब्द बने बोझिल,शब्दों को सहते सहते,ऊब गया, खुद पर शर्माता कोरा कागज़,जब भी उठती कलम चिल्लाता कोरा कागज।लाखों खोए वीर वतन पर मिटनेवाले,नहीं यहाँ पर कोई उनपर लिखनेवाले,कब आएंगे वे दिन,कब वो कवि बता दे,बलिदानी के नाम शब्दों की झड़ी […]

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