HOLI/होली

एक दौर था अभावों का,तब पकवान बामुश्किल बनते,और रंग खरीदने को पैसे भी कम थे,मगर होली का रंग कैसा? ये मत पूछना,बस उमंग ही उमंग थे, रंग ही रंग थे।तब बनती थी दोस्तों की टोलियाँ,टूट पड़ते उनपर जो छुपते,शर्माते,नजरों से बचना नामुमकिन,कौन ऐसे जो कोरे रह जाते,तब बजते ढोलक,झाँझघर-घर होली गाते,माना अभावों का दौर थामगर […]

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MAA-BAAP/माँ-बाप

एक दौर था जब थकान किसे कहते मालूम नही था। कदम चलते नही,उड़ते थे। बाईस,तेईस की उम्र तब मैं दिल्ली में था। जहाँ एक वाक्या हुआ जिसने जीवन के कई सवालों के जवाब दे गए। मैं वहाँ किसी कम्पनी में काम करता था जहाँ हम नौजवानों के बीच लगभग एक साठ वर्ष के बुजुर्ग को […]

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Murkh hain hum achchha hai/मूर्ख हैं हम अच्छा है।

जिनके पास दौलत अकूत,क्यों ना कमाए वेउसे चोरी और फरेब से,बुद्धिमान वही,मगर उन्हें सुकून कहाँ,ठहाके लगाते कब वे,माना हम मूर्ख,जिंदगी की लगी पड़ीमगर कल्पनाओं में खोए,यूँ ही अकारण निरंतर लिखते-पढ़ते,माना दौलत नही हमारे पास,मगर झूठे नही,ना ही मक्कार हम,सुकून से सोते,हँसते-हँसाते,हम औरों को रुलाते कब हैं,कब दिखाते अभाव,हम नीर बहाते कब हैं? !!!मधुसूदन!!!

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