KAVITA/कविता

जब-जब सत्ता भटक गई,कविता फिर राह दिखाती है, मद में सिंघासन के जो फिर,उनको सबक सिखाती है। ये सदियों से निरंकुश सत्ता से जा टकराती है, सुप्त पड़े जनमानस में नवयौवन ये भर जाती है वतन घिरा जब भी संकट में मौन उसे स्वीकार नही, हृदयहीन तब रचना जिसने उगल सका अंगार नहीं, शहर,गांव के […]

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परिवर्तन/Pariwartan

आशियाना बदलते रहे उम्र भर,कुछ भी बदला नहीं, हम बदलते रहे धर्म और जातियां,कुछ भी बदला नहीं । हम अकेला चले कारवां बन गया, देखते-देखते ये जहाँ बन गया, जब जुआरी थे हमको जुआरी मिला, जब बने हम शराबी शराबी मिला, हम जैसा थे वैसा जहां बन गया,कुछ भी बदला नहीं, हम बदलते रहे धर्म […]

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