KAVITA/कविता

जब-जब सत्ता भटक गई,कविता फिर राह दिखाती है, मद में सिंघासन के जो फिर,उनको सबक सिखाती है। ये सदियों से निरंकुश सत्ता से जा टकराती है, सुप्त पड़े जनमानस में नवयौवन ये भर जाती है वतन घिरा जब भी संकट में मौन उसे स्वीकार नही, हृदयहीन तब रचना जिसने उगल सका अंगार नहीं, शहर,गांव के […]

Posted in LekhniTagged 11 Comments on KAVITA/कविता