TAHKHAANAA/तहख़ाना
जब भी हम उनसे मिलते थे,नित्य नए परतें खुलते थे,उन परतों में उलझ गए दिल जिसका हुआ दीवाना था,समझ सके ना उनको,उनका दिल कोई तहख़ाना था।झील सी गहरी आँखें,जितना देखूँ डूबता जाऊँ,केश घने जैसे घन में अमीकरवैसे खो जाऊँ,मदहोशी क्या मैं बतलाऊँ,पाँव जमीं पर मैं ना पाऊँ,हूर परी,तिल होठों पर, कातिल उनका मुस्काना था,समझ सके […]
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